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Aviram

‘लघुकथा श्री’ सम्मान से सम्मानित लेखक अविराम को शुरुआत में लगा की बड़े होना बड़ा दिलचस्प होगा। आजादी होगी कहीं भी आने-जाने की, कुछ भी खरीदने और खाने की। और भी बहुत सारे ऐसे ही ख्याल मन में आये तो बड़े होने की जल्दबाजी में 12 वी पास करते-करते ही खुद अपने विद्यार्थियों से कंप्यूटर का ज्ञान साँझा करने लगे। सिर्फ अध्यापन ही नहीं एक ज्वेलरी डिज़ाइनर और एक गाइड जैसे पेशों से गुजरते हुए सफर की संजीदगी को समझने का प्रयास अब भी जारी है। एक अरसा गुजर चुका है।

बड़े हुए तो लालच ने कुछ नौकरी भी करवानी चाही। जयपुर के एक नामी संग्रहालय से जुड़ाव हुआ तो पहला शौक पूरा हुआ, देश-विदेश के पर्यटकों से मिलने का। जहाँ अनुभवों को साँझा करने का हर एक का अलग अंदाज भी खासा असर डालता रहा। अगला पड़ाव जयपुर की ही एक नामी मेडिकल यूनिवर्सिटी का हॉस्पिटल रहा। जहाँ बीमारी और बीमार दोनों को एक साल अपने जीवन का समर्पित कर आगे बढे। अंत अगर एक बार ठीक से समझ लिया जाये तो सफर का डर ख़त्म हो जाता है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। अब ज्यादातर समय घुमक्कड़ी करते हुए ही पाए जाते है और जब घुमक्कड़ी नहीं चल रही हो तो किसी हॉस्पिटल में मिल जाया करते है।

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Zahar Kharidi

पूरी दुनिया में मृत्यु का 9 वा सबसे बड़ा कारण रोड एक्सीडेंट है। इसे पढ़कर जैसा आपको लगा अविनाश को भी जानकर बिलकुल वैसा ही लगा था। पिता प्रकाशराज तो हिल गए थे ये जानकर। सवाल जब व्यापार का हो तो कुछ पेचीदा फैसले लेने ही पड़ते है। और फिर आम आदमी तो जब सिगरेट, शराब आदि खरीदता है तो पता होता है की वो ज़हर खरीद रहा है लेकिन क्या सहूलियत के लिए जो आम आदमी इन मशीनों को खरीदता है वो इनसे मरने के लिए इन्हे खरीदता है। उसे नहीं पता होता की वो ज़िन्दगी आसान कर रहा है या मौत आसान चुन रहा है। जो मारने से पहले दस्तक तक नहीं देती है। पूरी दुनिया में मृत्यु का 9 वा सबसे बड़ा कारण रोड एक्सीडेंट है। इसे पढ़कर जैसा आपको लगा अविनाश को भी जानकर बिलकुल वैसा ही लगा था। पिता प्रकाशराज तो हिल गए थे ये जानकर। “सवाल जब व्यापार का हो तो कुछ पेचीदा फैसले लेने ही पड़ते है।”, ऐसा कहने वाले कॉर्पोरटे कबूतरों की कहानी है ज़हर ख़रीदी। और फिर आम आदमी को इससे क्या क्यों की जब सिगरेट, शराब आदि खरीदता है तो पता होता है की वो ज़हर खरीद रहा है लेकिन क्या सहूलियत के लिए जो इन मशीनों को खरीदता है वो इनसे मरने के लिए इन्हे खरीदता है। उसे नहीं पता होता की वो ज़िन्दगी आसान कर रहा है या मौत आसान चुन रहा है। जो मारने से पहले दस्तक तक नहीं देती है। थोड़ी देर से ही सही, बातें समझ तो आती हैं लेकिन सीख अपने साथ जो ठोकर लेकर आती हैं, मानों एक के बिना दूजी अधूरी। अखबार के एक पन्ने के किसी कोने में आयी अनियंत्रित गाड़ी और एक्सीडेंट की खबर कोई खास भले ना लगे, जब तक की उसमे आपने किसी आपने को ना खोया हो, लेकिन यह एक्सीडेंट हर दिन 3000 से ज्यादा लोगों की जान ले लेते हैं। और आपके साथ भी फिर होता वहीं है इन एक्सीडेंट्स में जो लाखों एक्सीडेंट के मामलों में होता है। जिम्मेदार गाड़ी बनाने वाली कंपनी हो या चलाने वाला ड्राइवर,थोड़ा बहुत इंश्योरेंस क्लेम हुआ नहीं की सारे के सारे अपराधी, निरपराधी घोषित। “ज़हर ख़रीदी” एक ऐसा उपन्यास है जिसके किरदार हरपल पढ़ने वाले को खुद में व्यस्त रखने की काबिलियत रखते हैं। मीठा बोल पीठ में खंजर घोपने की बात हो या प्यार और परिवार को साथ लेके चलने की। लालसा मोहब्बत की हो या पैसे की। किस्से फ़िरोज़ाबाद के भी हैं और सिलीगुड़ी के हांगकांग बाजार के भी। कुल मिला के ज़हर ख़रीदी के पास काफी कुछ है आपके लिए।